जीवनसाथी

माँ जब थकने लगी,
तो साथी मैंने हाथ तुम्हारा थामा।

जब वंश बढ़ने की बात हुई
तब समर्पण तुम्हारा माँगा ।

मैं जीवन – पथ में बढ़ता रहा
तुम बाट मेरा जोहती रही ।

नए रिश्ते और साथी बनाता रहा
बच्चों और उत्तरदायित्वों में तुम खोती रही।

मैं आसमानों में विचरता रहा
तुम कसौटियों से जूझती रही ।

बच्चे अब अलग हैं , मेरे बालों में भी सफेदी है
रातों में खांसी भी अब सताती है ।

अब सूनेपन में तुम्हारा साथ चाहता हूँ
इस मोड़ में मैं अब तुम्हे चाहता हूँ ।

चाय की चुस्कियों में अब तुम्हारी मिठास नहीं
जीवनसाथी अब रिश्तों में तुम्हारा नाम नहीं ।

2 responses to “जीवनसाथी”

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