माँ जब थकने लगी,
तो साथी मैंने हाथ तुम्हारा थामा।
जब वंश बढ़ने की बात हुई
तब समर्पण तुम्हारा माँगा ।
मैं जीवन – पथ में बढ़ता रहा
तुम बाट मेरा जोहती रही ।
नए रिश्ते और साथी बनाता रहा
बच्चों और उत्तरदायित्वों में तुम खोती रही।
मैं आसमानों में विचरता रहा
तुम कसौटियों से जूझती रही ।
बच्चे अब अलग हैं , मेरे बालों में भी सफेदी है
रातों में खांसी भी अब सताती है ।
अब सूनेपन में तुम्हारा साथ चाहता हूँ
इस मोड़ में मैं अब तुम्हे चाहता हूँ ।
चाय की चुस्कियों में अब तुम्हारी मिठास नहीं
जीवनसाथी अब रिश्तों में तुम्हारा नाम नहीं ।

Leave a reply to Nandasmita जवाब रद्द करें