सखि, कौन सा मास ?
भोर नहीं हुई,
क्या है चौमास ?
गीली सी हवा,
क्या मेघ रहे बरस ?

सखि, क्यों मौन हो ?
मैं देख रही सब,
क्यों आकुल हो ?
मैं, तो धीर-धरी,
तुम क्यों विचलित हो ?

सखि, क्या याद नहीं ?
आर्य आए थे,
द्वार बारात भी आई।
सभा के समक्ष,
वरमाला थी पहनाई।

सखि, वो वेला पावन,
आर्य का रूप,
अति मनभावन।
जो दृष्टि पड़ी उनपर,
सकुचाया था मन।

सखि, फिर हुई विदाई,
वधु बनकर मैं,
आर्य संग आई।
मुख देखकर,
माता ने लाड जताई।

सखि, यह नियति-निष्ठुर,
बीते नहीं, संग कुछ दिन,
वो हो गए फिर दूर,
प्राण भी संग ले गए,
देह हुई पाथर।

सखि, कौन सा मास ?
भोर नहीं हुई,
क्या है चौमास ?

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