खुली हवा में सांसें लेना,
एक सपना सा लगता है।
हरी वादियां देख पाना,
अब नामुमकिन लगता है।
हर तस्वीर धुंधली लगती है,
आँखों की चमक कोहराती है।
सुर-ताल का पता नहीं,
बस खों- खों की थाप सुनाई देती है।
मानव नहीं हम महामानव बन रहे हैं,
शिव सा विष पी रहे हैं।
धन दौलत तो दे देंगे,
पर बच्चों को क्या सेहत दे पाएंगे ?
जब विज्ञान पढ़ाएंगे,
तब फेफड़े का क्या रंग बताएंगे ?
चमक- दमक या
ज़िन्दगी को तंग बताएंगे ?
सिर्फ उलझनें देंगे
या हल भी बताएंगे ?
नसों में धुआं दौड़ रहा है,
लहू का रंग बदल रहा है।
अब और किस क्षण की प्रतीक्षा है?
इतना सन्नाटा क्यों है ?
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